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आ बात हर विद्वान मानै के, रूंखड़ै दईं मिनख माथै बी
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प्रक्रति समाज अर जात रो असर पड़ै है
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मिनख समाज रो ई ज भेदियो है
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आपसी हेळ मेळ मिनख नैं मिनख बणावण मैं मदद करै
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जिण देस में, जिसा आपसी जातिबाड़ी सम्बंध हुवै
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बिसी ही मिनख री भावधारा बण जावै
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पण इण सम्बंध में आ बात ध्यान राखै जिसी है कै आ आपसी सम्बंदा री
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आबहवा अर उण सिलसिलै मैं बणी थकी जीवणी रो सुभाव नै
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बिचार एक दूजै रै समानांतर चालै
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इण दो बातां में, कटै ही कोई कार्य कारण सम्बंध नहीं बिठायो जा सकै
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इण बात सूं इनकार नहीं कियो जा सके कै, राजस्थान मैं भी
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खास तरै रा आपसी सम्बंध है अर खास तरै रो बांरो इतिहास है
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इण वास्ते राजस्थान मैं मानखै रो जिसो रूप कयो है
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उण रो अध्ययन कई तरै सूं कियो गयो है
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इण लेख मैं, मैं केवल मनोविज्ञान री द्रिस्टि सूं
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राजस्थान मैं रैवण वाळै मानखै रो, रूप देखणो चाहूं हूँ
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आ बात, घणी बार देखण मैं आई है के
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मनोविज्ञान री नजर सूं देखण सूं
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मानखै रा कई सम्बंध नयै तरीकै सूं, दीखण लाग जावै
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मारवाड़ में रातीजगां नै ईलोजी री जिकी आपसी अभिव्यक्ती हुई है बा इण बजै सूं हीच हुई है
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पाली रै भरे बाजार मैं ईलोजी जिण तरै सूं
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टांगां खोल्योड़ा बैठ्या है
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बो इण रम्योड़ै री स्तिति रो हीच कारण है
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फ्रायड रै हिसाब सूं, राजस्थान में
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टाबरां रै मायनैं, आडिफळ उळझण, अणचीती, निकळ जावै
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उण सूं पिता रै प्रति टाबर अकड़योड़ो भिन्न तरीकै सूं रैवै
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उण मैं ध्वज भंग भय रो डर घणै मान सूं बण्योड़ो रैवै
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राजस्थान मैं रैवणवाळी लुगई मानखी पर भी, इणरो असर खूब पड़यो है
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पड़दै रै नीचै जिको परिवर्तन आयो है, बो इण प्रभाव नैं भरे पूरे रूप मैं प्रकट करै
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ओ प्रभाव उण परिवारां मैं भी मौजूद है, जिका परिवार पड़दो छोड़ चुक्या है
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बठै भी छोरियां इण प्रभाव सूं कोरी कोनी
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घड़ी घड़ी मैं बां रो, ध्यान आपरै सरीर कानी जातो रैवै है
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इण में फ्रायड री, आ थापना ठीक लागै कै ऐहैम मूल रूप सूं
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सरीर सूं निर्धारित हुया करै अर सरीर में कदेई कदेई
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वातावरण रा बै भाग बी आ जावै
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जीका रो मानखै सूं नजदीकी सम्बंध रैवै
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राजस्थान रै, मानखै रो स्वभाव, इण कारण सूं उग्र है
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वो बात बात में बिखर जावै
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इण वास्ते मनोविज्ञान री द्रिस्टि सूं, अठै मानखै रा
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जिका व्यवहार मिलै है, वै बिखर्योड़ै मिनख रा व्यवहार है
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कौटिल्य रै अर्थसास्त्र में, मानखै रो जिसो रूप दियो है
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अठै रो मानखो उण सूं दूर नहीं जा सक्यो है
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राजस्थान में सामन्तवाद लगभग, बारा सताब्दियां तक रयो
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उण रो असर भी अठै रै मानखै, अर उण री संस्क्रिति माथै पड़यो है
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आखा तीज, ल्होड़ी तीज, बड़ी तीज रो भेद बी इण वजै सूं मिलै है
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संस्क्रिति रै, अन्तर्व्यापक अर अन्तर्विरोधि री बात अठै नहीं भी करां
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तो भी मानखै में ऊंचता रो भाव अर, एक प्रकार रो घमंड घर कर्योड़ो है
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इण तरह सूं अठै रै मानखै में किणी तरेह री मिनखपणै री बात नहीं रैहगी है
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उण रो विध्वंस हूग्यो है
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उण रै ज्ञान री उपलब्धि, बिनां मूल्यां रै हू रही है
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जीवण सूं अळगो रैहैर, वो आपरै ज्ञान रो, सिरजण कर रयो है
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वो कदेई कदेई ठेट ग्यान री बात तो करै
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पण सही नतीजां माथै, नहीं पूगै
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आज रो मानखो एकाकी, अनासत्त्क
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असम्पृत्त्क, निर्बल अर घबरायोड़ो है
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न तो आपरो भलो करण री स्थिति में है
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अर न बो आपसी सम्बंदां नैं ही ठीक तरै सूं चला सकै है
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उण रै वास्तै, खुद उण रो अस्तित्व, बिना मतलब रो हूग्यो है
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वो नित बढ़तै ज्ञान नैं, समझा सकै
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वो वै सारी मानखी योग्यतावां खोतो जा रयो है
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जिणां में उपयोग, विवेचन, पिछाण, परख
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आखी जगती में विस्तार करण अर मोल आंकणै री सगती हुया करै
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उण रै वास्तै, एक संकटमय प्राण री इस्थिति उत्पन्न हूगी है
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इण वास्तै, रे मानखा तनैं अपणै आपनैं बदलणो है
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जियां पिच्छम रा लोग कैवै तनैं मिनखां रै
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सरस्वती देवता री तरयां, सांझ री बेळां उठणो है
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थारै वास्तै, मांझल रात ढळकी है
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तूं अबै हूँकारो देवण री स्तिथि सूं आगै बढग्यो है
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तनै जाण लेणो चाहीजै कै थाऊं बढिया चीज
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इण प्रक्रिति अर जगती में दूजी कोई भी कोनी
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इण वास्तै चेत मानखा चेत
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जाग मानखा जाग, थारो मूळ निसरयो जाय
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पणघट री सांझ
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धरती आखे दिन कुम्हार रै तवे री ज्यूं, तेंताई है
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दसूं दिसा रे बिल मांय सूं निकळ निकळर आग री लपटां, आकास रे कण कण में अणसुहांती आंच भरदी है
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प्रचंड लूआं, तवै सी तपती धरती री सपाट छाती पर, उन्मत आंधे क्रोध से हज़ार हज़ार राकसियां री ज्यूं हा हा हू हू करती भागी है
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रस्ते री रुकावट नहीं, दिसा रो ज्ञान नहीं, घड़ी पलक ठेहरबा री फ़ुरसत भी नहीं, बस ऊंचा नीचा टीबड़ां पर गिरती पड़ती अर अपणी हजार हजार मूठियां से बाळूरेत रा मोटा मोटा टीबां नैं आकास में उछाळ उछाळर नास रो माहारास रचायो है वां
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जीवण रो खोज जठे भी दिखाई दियो है, आपरी लाल लाल जीभां सै बीनें चाट चाट र बै अपणे प्रबल अट्टहास सूं अग जग रो कूंणो कूंणो गुंजायो है
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जिका रे जीव है अर भाग अर प्राण छिपावण नैं आसरो है, बै आळे दिवाळे अर कूणे कोठे में प्राण छिपायां हांफ़ हांफ़ र दिन बितायो है
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खैंखार करती आंधी घरां रे बंद किवाड़ां नें, जोर जोर से भड़ भड़ाय र भीतर वाळा नें बारे आवो समजायो है
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आंखे दिन, सिस्टि री छाती पर संघार रो तांडव नाच हुयो है
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अकास से आगे अकास से, आग बरसी है, अर धरती सैं लपटां उठ उठ र ऊपर गई है
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पण अब, दिन रो तीसरो पैहर बेगो बेगो ढळ रयो है
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लूवां, जिकी आंखे दिन उन्मत्त री ज्यूं भागती फिरी है, अब थकावट सै चकनाचूर होय र टीबां री ढळती छायां तळै जा लेटी है
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बांरी गरम गरम निसास अठै तांई आ री है
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चिड़ी, कमेड़ी आळा दिवाळा छोड़ र नीचै आ उतरी है
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म्हारे घर रे सामै जिको घेर घुमेर नीम है, बौ लूवां री ऊधम पर आखे दिन क्रोध में फ़ुफ़कार फ़ुफ़कार र अब सूनूं सूनूं सो, निरभ अकास कानी सिर उठाय र तपती बैरागी री ज्यूं चुपचाप ऊभो है
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बींरी छांयां बांई बगळ में कूवै री ऊंचीं जगत नैं चूमती हुई म्हारे फळसे तांई, लांबी लेटी पड़ी है
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मैं हुक्को लेर फ़ळसे आगै नीम री छांयां तळे, आ बैठयो हूं
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प्रकर्ति गुम सुम पड़ी है, जाणे कोई नई बीनणी लांबी बीमारी सूं ऊठ र अबार अबार ही बारे आई है, और आस पास नैं देख र
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चुपचाप सूनी सूनी सी उदासीन सी खड़ी है
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कूवै रा ऊंचा ऊंचा मरवां पर कबूतरां री गुटरगूं सरु हो चुकी है
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चिड़ियां, चैहैकबा लागगी है
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जीवण अर चेतना रो संगीत आरंभ हो गयो है, अर मैं अपणी खाट पर चित्त पड़यो निर्भर आकाश कानी ताकतो ताकतो
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कल्पनावां रे ऊंचे सूं ऊंचे अकास में, जा पूच्यो हूं
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पण मेरी आंख, मुंदैली नहीं
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पड़यो पड़यो देखूं लो के बारियो चढ़सर मोटी लाव उठायां आवे है
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पाछे पाछे कीलियो आपरा बळदां, नैं टिचकारी देतो आ रयो है
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बळदां रे कंठां मैं पड़ी पीतळ री छोटी छोटी घंटयां री, सुरीली टुन टुन में, जिन्दगी रो जादू भरेड़ो आतम विसरामी संगीत है
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थोड़ी देर पाछे बारियो जाणे तो कांई चीज ठरकावेलो, पण ठक ठक री आवाज़ गांव पर सूं गूंजती क्षितिज रे दरवाजे पर टकराय टकरायर पाछी लौटेली, अर पछे गूंजेली कीलियै री ऊंडी आवाज
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